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राबड़ी आवास पर नहीं हुई इफ्तार पार्टी, दो दशक पुरानी परंपरा टूटी; सियासत में शुरू हुई बयानबाजी

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पटना। बिहार की राजनीति में लंबे समय से चली आ रही एक परंपरा इस बार टूट गई, जब राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के परिवार की ओर से आयोजित होने वाली इफ्तार पार्टी नहीं हुई। हर साल रमजान के दौरान पटना के 10 सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी आवास पर भव्य इफ्तार का आयोजन किया जाता था, जिसमें सत्तापक्ष और विपक्ष के नेता एक साथ नजर आते थे। लेकिन इस बार इस जगह पर सन्नाटा पसरा रहा, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
करीब 20 वर्षों से यह इफ्तार पार्टी बिहार की राजनीति का एक अहम हिस्सा मानी जाती रही है। इस आयोजन में न केवल आरजेडी के नेता और कार्यकर्ता शामिल होते थे, बल्कि विभिन्न दलों के वरिष्ठ नेता भी पहुंचते थे। यह मंच राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सामाजिक सौहार्द और संवाद का प्रतीक बन चुका था। ऐसे में इस बार इसका आयोजन न होना कई सवाल खड़े कर रहा है।
इस मुद्दे को लेकर जदयू की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। पार्टी के प्रवक्ता नीरज कुमार ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह परंपरा पहले नियमित रूप से निभाई जाती थी, लेकिन अब इसमें लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। उन्होंने इशारों-इशारों में यह भी कहा कि पहले जहां छठ जैसे पर्वों पर भी सक्रियता दिखती थी, अब वहां भी सन्नाटा देखने को मिलता है।
हालांकि जदयू प्रवक्ता ने यह भी कहा कि वे इस मुद्दे को पूरी तरह राजनीतिक नजरिए से नहीं देख रहे हैं, लेकिन परिस्थितियों में बदलाव जरूर आया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बड़े आयोजनों के लिए एक मजबूत व्यवस्था और समन्वय की जरूरत होती है, जो शायद इस बार देखने को नहीं मिली।
वहीं, आरजेडी की ओर से इस पूरे मामले पर सफाई दी गई है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि इस बार इफ्तार पार्टी का आयोजन स्वास्थ्य कारणों और कानूनी व्यस्तताओं की वजह से संभव नहीं हो पाया। बताया गया कि लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी दोनों ही स्वास्थ्य संबंधी कारणों और कोर्ट-कचहरी के मामलों में व्यस्त रहे, जिसके चलते इस बार यह परंपरा निभाई नहीं जा सकी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इफ्तार पार्टी जैसे आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक महत्व भी रखते हैं। यह नेताओं के बीच संवाद और संबंधों को मजबूत करने का एक अवसर होता है। ऐसे में इसका आयोजन न होना निश्चित रूप से चर्चा का विषय बन गया है।
पिछले वर्ष भी इफ्तार पार्टी को लेकर कुछ बदलाव देखने को मिला था। उस समय आयोजन अब्दुल बारी सिद्दीकी के सरकारी आवास पर किया गया था, जिसमें तेजस्वी यादव समेत कई बड़े नेता शामिल हुए थे। हालांकि वह आयोजन भी आरजेडी की ओर से ही आयोजित किया गया था और उसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे।
लेकिन इस बार स्थिति पूरी तरह अलग रही। न तो राबड़ी आवास पर कोई कार्यक्रम हुआ, न ही किसी अन्य स्थान पर पार्टी की ओर से इफ्तार का आयोजन किया गया। यहां तक कि पार्टी कार्यालय में भी इस तरह का कोई कार्यक्रम नहीं दिखा। इससे यह साफ हो गया कि इस बार परंपरा पूरी तरह से ठहर गई।
जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने आगे यह भी कहा कि राजनीतिक गतिविधियों में निरंतरता बनाए रखना जरूरी होता है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर इस तरह की परंपराएं अचानक खत्म हो जाएं, तो उसके पीछे कारणों को समझना जरूरी हो जाता है।
उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी संकेत दिया कि पार्टी के भीतर समन्वय और नेतृत्व को लेकर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। हालांकि, आरजेडी ने इन तमाम आरोपों और टिप्पणियों को गंभीरता से नहीं लेते हुए स्पष्ट किया है कि यह एक अस्थायी स्थिति है और भविष्य में फिर से इस परंपरा को जारी रखा जा सकता है।
इफ्तार पार्टी का यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह बिहार की राजनीति में एक ऐसा मंच बन चुका था, जहां अलग-अलग विचारधाराओं के नेता एक साथ बैठते थे और आपसी संबंधों को मजबूत करते थे। इस लिहाज से इसका न होना एक बड़ी कमी के रूप में देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, इस बार इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं होना एक साधारण घटना नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक और सामाजिक दोनों पहलू हैं। जहां एक ओर इसे स्वास्थ्य और परिस्थितियों से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे लेकर सवाल खड़े कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह परंपरा फिर से शुरू होती है या यह बदलाव स्थायी रूप ले लेता है।

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